सुलगती जिंदगी के धुएं

यह कौन सा दर्द है जो दिन-भर है रहता पर दिखार्इ नहीं पड़ता ओर रात होते ही जाने किस कोने से निकल पसलियों को चीरता नस-नस में पसर जाता है और हदय में बनकर कसक आंखो से फूटता झर-झर झरता है जाता । बहते-बहते ज़ख्मों को साथ लिए उन्हें तड़पाता, आगे बढ़ता जाता । लाखों मली दूरी तय करके कितने प्राणियों की प्यास बुझाता उनके पापो को हरता बढ़ता चला जाता किसी नदी-सा । दर्द का सोता शापित नदिया बन दूर तलक ........... More

Available ebook formats: epub

  • Category: Fiction » Classics
  • Words: 68,150
  • Language: Hindi
  • ISBN: 9789385818257
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