Dwand

अन्गिनत आकाश गंगाओ ं से समृद्ध हमारा बं्रम्ह्मडं नव निर्माण और
विलय, इन परस्पर विरोधी क्रियाओ ं म े सदैव सक्रिय रहता है। कही
जीवन के शुरवाती निर्माण के संकेत किसी दूरस्थित आकाश गंगा
मे उसके सूर्य मंण्डल के चक्कर काटते हुये नये नवेले ग्रह पर
मिलत े है, तो कही अत्यंत विकसित बुद्धि़ मान प्रजाती से समृद्ध ग्रह
अपनी आयु खत्म होने की वजह से प्रलय और विनाश की कगार
पर आकर अंतिम विध्वंस का सामना करता है। More

Available ebook formats: epub

  • Category: Fiction » Classics
  • Words: 74,420
  • Language: Hindi
Tags: dwand
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