Thahare paanee kee halachal

कभी सोचा भी न था कि मेरी कोई पुस्तक भी प्रकाषित हो सकती है। छात्र जीवन में थोड़ा बहुत लिखता रहता था। कुछ एक रचनाएं प्रकाषित भी हुई पर रोजी रोटी और पारिवारिक दायित्व को निभाने में सब कुछ छूट गया। कार्य से सेवानिवृत्त होने के उपरान्त चालिस सालो बाद एक बार फिर से लेखनी पकड़ी। हालांकि यह अन्तराल काफी बड़ा था पर अनेकों विचार भी मन में उमड़ घुमड़ कर रहे थें। समाज को देखने का दृष्टिकोण भी बदल चुका था। More

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